निर्माण
चित्त का विज्ञान
अंतर्यात्रा विज्ञान के प्रयोग, चित्त को परिष्क्र्त करते
है. चित्त की यह परिष्कृति जीवन को क्षमता
व सामर्थ्यवान बनाती है. जो सच्चे जिज्ञासु हैं, अनुभवी साधक है, जिनकी
अन्तश्चेतना, अंतर्यात्रा विज्ञान के प्रयोगों में लीं है, वे यह जानते हैं कि
चित्त की उर्जा ही जीवन की उर्जा के रूप में प्रगट होती है. इस उर्जा का स्वरूप
जैसा भी नकारात्मक या सकारात्मक होता है, जीवन भी वैसा ही नकारात्मक अथवा
सकारात्मक होता है.
योग-साधना चित्त की, जीवन की पृक्रति को संचालित करने वाली
नहीं है केवल अवरोधों को दूर किया जा सकता है. पृक्रति न केवल अपना शेष सञ्चालन
स्वयं करती है, बल्कि अपने कार्यों को पूरा भी
स्वयं करती है. यह सच्चाई जानने वाला साधक, अपनी साधना और
साधना की उपलब्धियों के अभिमान से बचा रहता है. ऋषि पतंजलि ने चित्त के सर्वथा
अभूतपूर्व स्वरूप, निर्माण चित्त के सत्य को उद्घाटित करते है :-
“निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात” जिसका शब्दार्थ तो बनाये हुए चित्त, केवल अस्मिता
से होते हैं. भावार्थ केवल यही है की निर्माण चित्त केवल अस्मिता से बने होते है.
इस सूत्र की सम्यक व्याख्या करने में व्याख्याकारों ने कुछ कंजूसी बरती है. जबकि
सिद्ध योगी अपनी इसी योग-प्रक्रिया के बल पर स्वयं को एक साथ कई स्थानों पर प्रगट
करते हैं. इसी के बल पर वे पाने मूल स्थान में, मूल स्वरूप से साधना करते हुए,
समाधिलीन रहते हुए एक साथ कई स्थानों पर जन्म ग्रहण करते हुए अनेक जीवनों में
भिन्न-भिन्न उद्देश्यों को पूर्ण करते हैं. इस महत्वपूर्ण सूत्र की तार्किक
व्याख्या के लिए सूत्रपदों के अर्थ पर विचार करना चाहिए. “निर्मीयंते इति
निर्माणानि; निर्माणानि च तानि चित्तानि, इति निर्माणचित्तानि “ जो बनाये गए हैं
चित्त, वे निर्माण चित्त है, किस तत्व (उपादान) से बनाये गए है? इस प्रश्न का
उत्तर है “अस्मितामात्रात” अस्मिता मात्र से.
इससे स्पष्ट होता है कि यहाँ चित्त शब्द का प्रयोग ‘मनस’
अंतःकरण के लिए हुआ है. बुद्धि या महत्तत्व के लिए नहीं. महत्तत्व की रचना अहंकार
से पहले हो चुकी होती है. अहंकार महत्तत्व के पश्चात् उत्पन्न होता है. इस सूत्र
में अहंकार से चित्त की उत्पत्ति बता कर यह स्पष्ट कर दिया है कि चित्त शब्द मन के
अर्थ में प्रयुक्त है. यहाँ सवाल यह भी है कि सिद्ध योगी क्या अपने पूर्व शरीर में
कुछ अंगों के अपहार तथा अपेक्षित प्रकति आपूर से एक समय में एक ही जत्यांतर परिणाम
करता है अथवा अपने पूर्व देह के अतिरिक्त अन्य देहों का निर्माण कर लेता है?
सिद्धयोगी द्वारा एक ही काल में अनेक देहों के निर्माण की
भावना ऋषि गौतम प्रणीत न्याय सूत्र के व्याख्याकार वात्सयायन मुनि के एक सन्दर्भ
से ज्ञात होती है, यहाँ प्रसंग है :- “ योगी निश्चित ही सिद्धियों के प्रादुर्भूत
हो जाने पर इन्द्रीय-व्यवस्था से बंधा नहीं रहता. वह इन्द्रियों सहित अन्य शरीरों
का निर्माण कर, उन-उन शरीरों में ज्ञातव्य पदार्थों को प्राप्त करता व जान लेता
है. यह स्तिथि के विभु होने पर संपन्न हो सकता है, अणु मन में नहीं, वह भी इसलिए
ज्ञान विभु आत्मा का गुण है अणु मन का नहीं. यहाँ यह तत्व स्पष्ट किया गया है कि
अणु रूप मन एक समय एक ही शरीर में रह सकता है; जबकि विभुरूप आत्मा एक साथ अनेक
शरीरों में रह सकती है.
निर्माण चित्त के सत्य को महान योगी मत्स्येन्द्रनाथ एवं
गोरखनाथ के प्रसंग से और भी स्प्सष्ट ढंग से समझा जा सकता है. यह प्रसंग बहु
प्रचलित है. वे कहते हैं कि एक बार योगी मत्स्येन्द्रनाथ किसी अति विशिष्ट साधना
के लिए कामरूप सेष चले गए, देवी कामख्या के सिद्ध क्षेत्र में यह कामरूप देश
स्त्री शाषित था. यहाँ नारियों का शाशन था. यहाँ की महारानी ललिता, योगसिद्ध नारी
थीं, उनकी योग विभूतियाँ, योग्शाक्तियाँ अलौकिक व अतुलनीय थी. यहाँ कोई बाहरी
पुरुष प्रवेश नहीं कर सकता था. वहां योगी मत्स्येन्द्रनाथ योगबल से पहुचे. उन्होने
अपने योगबल, ज्ञानबल से योग सिद्ध ललिता के दर्प को चूर्ण किया.
उनसे पराजित हो कर महारानी ललिता ने स्वयं का समर्पण उनके
चरणों में कर दिया. मत्स्येन्द्रनाथ भी प्रसन्नता से रानी ललिता के साथ रहे लगे.
इधर योगियों में यह हवा फ़ैल गयी कि महान योगी मत्स्येन्द्रनाथ योग्पथ से पथभ्रष्ट
हो गए हैं. अब वे स्त्रियों के बीच उलझ गए हैं. उनमे अब कोई योगशक्ति नहीं रही.
उनकी सर्वत्र निंदा देख कर उनके शिष्य गोरखनाथ अपने महान गुरु की निंदा सहन नहीं
कर सके. उन्होने सोचा की वे स्वयं कामरूप देश जायेंगे और अपने गुरु का उद्धार
करेंगे.
अपने संकल्प के अनुसार गोरखनाथ अनेक बाधाओं व विघ्नों को पार करते हुए स्त्रीवेश में कामरूप
देश पहुचे जहाँ मत्स्येन्द्रनाथ महारानी ललिता के साथ सभा में बैठे थे. अब तक उन दोनों
से एक पुत्र भी हो चूका था- मीननाथ. गोरखनाथ उस सभा में बैठकर मृदंग बजाने लगे. स्त्रीवेशधारी गोरखनाथ के मृदंगवादन से एक
ही सुर नक़ल रहा था- जाग मच्छनदर गोरख आया. गोरखनाथ के इन सुरों को मत्स्येन्द्रनाथ
ने पहचान लिया. उन्होने महारानी ललिता से कहा –“देवी ! अब हमारे प्रस्थान का समय
हो गया है. मेरे शिष्य गोरख मुझे लेने आ पंहुचा है.” महारानी ललिता ने उनकी आज्ञा
का पालन करते हुए उन्हें विदा कर दिया. कामरूप देश से निकल कर भी गोरखनाथ के अमन
में यह क्षोभ था कि उनके महान गुरु की संसार में घोर निंदा हो रही है. इसका सामना
वे कैसे कर सकेंगे ? गोरखनाथ के मन की चिंता को समझ कर मत्स्येन्द्रनाथ उन्हें अति
दुर्गम क्षेत्र में एक गुफा के पास ले कर गए. उनके कहने पर गोरखनाथ ने गुफा के
द्वार पर रखी शिला हटाई. शिला के हटने पर उन्होने जो द्रश्य देखा तो वे घोर आश्चर्य
में पड़ गए. वहां तो स्वयं मत्स्येन्द्रनाथ समाधि में लीं थे. गोरखनाथ के पास
पहुचने पर मत्स्येन्द्रनाथ ने आँखें खोलते हुए कहा –“आश्चर्य न करो वत्स ! मेरा
मूल स्वरूप यहीं पर साधनारत है. कामरूप देश जाने वाला मेरा शरीर तो मेरे निर्माण
चित्त द्वारा उपजा है. निर्माण चित्त के द्वारा मैं यहीं बैठे हुए अनेक स्थानों पर
एक साथ जन्म ले सकता हूँ, जीवन जी सकता हूँ, स्वयं को एक साथ अनके देहों मैं बिना
जन्म लिए प्रगट कर सकता हूँ.” ऐसा कहते हुए उन्होने कामरूप देश जाने वाले शरीर को
स्वयं के मूल शरीर में विलीन कर लिया. गोरखनाथ निर्माण चित्त के इस विज्ञान को समझ
कर, गुरु महिमा को जान कर नतमस्तक हो गए.
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