कुंडलनी
महाशक्ति व् उसकी संसिद्धि
मानवीय काया एक समूचा ब्रह्मांड है. आत्मसत्ता में सन्निहित
विश्व की इन समस्त विभूतियों को यदि साधनात्मक उपचारों द्वारा खोजा और जगाया जा
सके तो जीवात्मा को देवात्मा एवं पमात्मा बन्ने का अवसर मिल सकता है. इसी अन्वेषण
प्रयास को “ब्रह्म विद्दा” और जागरण प्रक्रिया को “ब्रह्मतेज संपादन” कहते हैं. इस
सन्दर्भ में शरीर स्तिथ सूक्ष्म चैतन्य केन्द्रों को जाग्रत एवं जीवंत करने और
उनके ब्रह्मकमल से उच्चकोटि का लाभ उठाने की प्रक्रिया कुंडलनी जागरण के नाम से
जानी जाती है.
कुंडलनी जागरण के महातम की योग्शाश्त्रों में जितनी चर्चा
हुई है उतनी किसी और साधना के सम्बन्ध में सार्वभौम स्तर पर नहीं मिलती.
योगवशिष्ठ, तेज्बिन्दुप्निषद, योग चूड़ामणि, ज्ञान संकलिनि तंत्र, शिव पुराण, देवी
भागवत, शंदिल्योप्निषद, मुक्तिकोपनिषद, हठयोग प्रदीपका,कुलावर्ण तंत्र,
योगनी-तंत्र, घेरंड-संहिता, कंठ-श्रुति,, ध्यान-बिन्दुप्निषद, रुद्रयामल-तंत्र,
योग-कुंडलयोप्निषद, शारदा-तिलक आदि ग्रंथों में इस विद्द्या के विभिन्न पहलूओं पर
प्रकाश डाला गया है.
कुण्डलनी क्या है? इसके सम्बन्ध में शास्त्रों और
तत्व-दर्शिओं ने अपने-अपने अनुभव के अधर पर कई अभिमत व्यक्त किये हैं. “ज्ञानारणव
तंत्र में कुंडलनी को विश्वजननी और स्रष्टि (काया) संचालनी शक्ति कहा गया है. शरीर
में यह मन, प्राण और शरीर को संगठित करती है. विश्व व्यापर एक घुमावदार उपक्रम के
साथ चलता है. परमाणु से लेकर गृह-नक्षत्र और कुम्हार का चाक भी घुमावदार चलता है.
“कठोपनिषद” मं यम-निचकेता संवाद में जिस “पंचाग्नि विद्द्या की चर्चा हुई है उसे
कुंडलनी महाशक्ति की विधि-विवेचना कहा जा सकता है. “श्वेताश्वर उपनिषद में उसे
“योगाग्नि” कहा गया है. “दैनिक योग-प्रदीपका” में उसे “स्प्रिट-फायर” कहा गया है.
जॉन वूडरफ सरीखे सुप्रसिद्ध तंत्रान्वेशी उसे “Serpentine
Fire” कहा है. थिओसोफ़िकल
सोसाइटी की संस्थापिका मैडम ब्लैवटस्की ने उसे विश्वव्यापी विद्दुत शक्ति “कॉस्मिक
इलेक्ट्रिसिटी” कहा है. उन्होने इसकी विवेचना विश्वविद्दुत के समतुल्य चेतनात्मक
प्रचंड प्रवाह के रूप में की है. अपने ग्रन्थ “Voice
of Silence” में उन्होने कहा है की सर्पवत गति अपनाने के कारण उस
महाशक्ति को कुंडलिनी कहते हैं.
ब्रह्माण्ड में दो प्रकार की शक्तियां कम करती हैं. एक तो लौकिक-सेक्युलर
और दूसरी आध्यात्मिक-स्प्रिचुअल. इन्हें ही फिजिकल और मेटाफिजिकल कहते हैं. इनमे
से कुंडलिनी ब्रह्माण्डव्यापी आध्यात्मिक शक्ति है. चिकित्साविदों ने उसे
नर्वसफ़ोर्स कहा है. विज्ञानवेत्ता Dr.Rely ने अपने
बहुचर्चित पुस्यक “मिस्टीरियस कुंडलिनी” में उसकी व्याख्या “VEGAS
NERVS” के रूप में की है. इसी किताब की भूमिका में तंत्र मर्मग्य
जॉन वुडरफ ने रेले के इस अभिमत से असहमति प्रकट की है कि यह शरीर संसथान की
विद्दुत धरा मात्र है. उन्होने लिखा है “ वह एक चेतन और महान सामर्थ्यवान शक्ति
है. “Grand Potential” है उसकी तुलना
अन्य किसी पदार्थ या प्रवाह से नहीं की जा सकती है. यानि न तो वह भौतिक पदार्थ है
और न ही मानसिक शक्ति. वह स्वयं इन दोनों प्रवाहों को उत्पन्न करती है. स्थिर
सत्य-स्टेटिक रियल और गतिशील सत्य-फेनामिक रियल एवं अवशेष शक्ति “रेजिडुवल-पावर,
के समन्वित प्रवाह की तरह इस स्रष्टि में कार्य करती है.
विज्ञान की भाषा में कुंडलिनी को
जीवनी शक्ति अथवा जैव चुम्बकीय विद्दुत कहते हैं. इसका केन्द्र मस्तिष्क मन गया है
तो भी यह रहस्य अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है की मस्तिष्क को अपनी गति-विधियों के
संचालन की क्षमता कहाँ से मिलती है. योगशाश्त्र इसका उत्तर मूलाधार में निहित काम
बीज की ओर संकेत करते हुए बताता है की अव्यक्त मानवीय सत्ता को व्यक्त होने का
अवसर इसी केन्द्र से मिलता है. वही काम-तंत्र के विभिन्न क्रिया-कलापों के लिए
आवश्यक प्रेरणा भी देती है. यही वह चुम्बकीय “क्रिस्टल” है जो काया के transistors को चलाने वाला आधार खडे करता है. काम-शक्ति
के प्रकटीकरण का अवसर ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से मिलता है. अत: उस स्थान पर अवस्तिथ
मूलाधार चक्र को कुंडलिनी-केन्द्र एवं संक्षेप में “कुण्ड” कहते हैं. हठ योग के
व्याख्याकारों ने वस्तिक्षेत्र के गुहर में अंडे की आक्रति वाले “कंद” के साथ उसका
सम्बन्ध जोड़ा है. शिव संहिता में कहा गया है “गुदा से दो अंगुल ऊपर और लिंगमूल से
एक अंगुल नीचे चार अंगुल का क्षेत्र “कंद” का प्रमाण है. इसी में आगे वर्णन है कि
गुदा एवं शिश्न के मध्य में जो योनी है वह पशिमभिमुखी अर्थात पीछे को मुख है. उसी
स्थान में “कन्द” है जहाँ सर्वदा कुंडलिनी स्तिथ है.
कुंडलिनी परिचय के स्थान-स्थान पर
“स्वयंभू लिंग” की चर्चा है, शरीर में यह घटक सुषुम्ना के नीचे वाला अंतिम छोर है
जिसे “कांडा इक्वाइना” कहते हैं. सूक्ष्म शरीर के “कन्द” का इसे पतिनिधि कहा जा
सकता है. कुंडलिनी को “सार्वभौमिक जीवन
तत्व” कहा है. इसके भीतर आकर्षण व् विकर्षण दोनों ही धाराएं विद्दयमान हैं. भौतिक
विज्ञान की द्रष्टि से उन प्रवाहों को जैवीय विद्दुत एवं जैवीय चुम्बकत्व कह सकते
हैं, मनीषी हर्बर्ट स्पेंसर के अनुसार इसे “ESSENCE OF LIFE” जीवन-सार कहा
जा सकता है. बाइबिल के अनुसार यही तत्व “महान सर्प” है. आध्यात्मशाश्त्र इसे
ब्रह्माग्नि कहते हैं और इसका केन्द्र ब्रह्म-रंध्र को मानते हैं. वहां से यह
मूलाधार की ओर दौडती है और वापस आती है. स्वामी विवेकानंद के अनुसार “ वह केन्द्र
जहाँ समस्त अवशिष्ट संवेदनाये संचित संग्रहित हैं “मूलाधार चक्र” कहलाता है. वहां
पर कुंडलित क्रिया-शक्ति को कुंडलिनी कहा जाता है. प्राणायाम व् योग साधना से इसे
जगाया जा सकता है और नर से नारायण बना जा सकता है.
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