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इलेक्ट्रोनिक ध्यान
“ न्यू माइंड – न्यू बॉडी “ नमक किताब की लेखिका मनोचिकित्सक डॉ. बारबरा ब्राउन कहती हैं की “ बायोफीडबैक “ के द्वारा मन:स्तिथि की उत्तेजना को शिथली-करण में बदलना तथा मानसिक सजगता और मस्तिष्कीय सामंजस्य को आंकना इस युग की सबसे बड़ी उपलब्धि है. सचमुच यदि मनश्चेतना पर यंत्रों के माध्यम से ही सही, मनुष्य को योग-साधना द्वारा नियंत्रण करने की विद्दा सिखाई जा सके, तो इसे चिकित्सा-विज्ञान का अदभुत अनुदान कहा जायेगा.
मानवीय काया से लगातार विविध प्रकार की विदुतीय संकेत निकलकर बाहरी वातावरण में विसर्जित होते रहते हैं, जिन्हें विभिन्न उपकरणों के माध्यम से जांचा-मापा और उनसे उत्पन्न संकेतों के माध्यम से यह ज्ञात किया जा सकता है की शरीर स्वस्थ है अथवा अस्वस्थ. ह्रदय से निकलने वाली विद्दुतीय तरंगें सबसे अधिक शक्तिशाली होतीं हैं. मस्तिष्क से भी लगातार विद्दुतीय तरंगे मानसिक स्तिथि के अनुरूप विभिन्न रूपों में निकलती रहती हैं, परन्तु ह्रदय की विद्दुतीय तरंगों की तुलना में ये अपेक्षाक्रत कमजोर और जटिल होती है. इसके अतिरिक्त त्वचा तथा मांस-पेशियो से निकलने वाले संकेतो की आव्रत्ति उच्च होती है. ये सभी संकेत यह बताते है कि मनुष्य की वास्तविक मन:स्तिथि एवं उससे संचालित शारीरिक स्तिथि कैसी है. मानसिक स्तिथि के अनुसार ही व्यक्तित्व का निर्धरण होता है.
इस सन्दर्भ में प्रख्यात अमरीकी मनोवैज्ञानिक जे,कामिया तथा डॉ. बारबरा ब्राउन ने गहन अनुसंधान करके बताया की यदि शरीर से निकलने वाली विभिन्न विद्दुतीय संकेतो में किसी तरह आवश्यक परिवर्तन, या परिवर्धन किया जा सके, तो न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को अक्षुण रखा जा सकता है वरन मानसिक चेतना को भी परिष्क्र्त किया एवं उच्चस्तरीय बनाया जा सकता है. इनका मत है कि जब तक हम अपने अंतर-बाह्य प्रक्रियाओं तथा उनपर पड़ने वाले विचारों एवं संकल्पों के प्रभावों को अच्छी तरह समझ नहीं लेते, तब तक चेतना के क्षेत्र में वाँछित परिवर्तन कर सकने में समर्थ नहीं हो सकते, क्रिया-कलापों के प्रति जागरूकता नहीं होने पर उनको नियंत्रित नहीं किया जा सकता. इसकेलिए बायोफीडबैक पद्धति को बहुत उपयोगी पाया गया है.
योग-विद्दा के जानकार जानते है कि योगाभ्यास की विभिन्न प्रक्रियाएं शारीरिक और मानसिक क्रिया-कलापों के नियंत्रण में प्रभावशाली भूमिका निभाती है. उसके साथ विचारणाओं-भावनाओं के परिष्कार का उपक्रम भी जुड़ा रहता है. इसके बिना समाधिस्तर का सुख एवं चेतना के उच्च आयामों की उपलब्धि नहीं होती, परन्तु यह एक समय एवं श्रमसाध्य प्रक्रिया है.
आधुनिक विज्ञानवेत्ताओं ने योगाभ्यास परक प्रथम आवश्यकता पूर्ती के निमित्त बायोफीडबैक पद्धति को सर्वोत्तम पाया. इसके द्वारा उपलब्ध परिणामों को मशीन पर आँखों द्वारा सीधे देखा जा सकता है, जबकि पूरवर्ती प्रक्रिया अनुभूति मूलक है. सामने चलते हुए संकेत अथवा कौंधते हुए लाइट बार को देख कर साधक अपने मानसिक स्तर को स्वयं समझ सकता है और तदनुरूप उसमे हेर-फेर कर सकता है. इतना ही नहीं इसके द्वारा समस्त शारीरिक हलचलों, ह्रदय, मांसपेशिओं, त्वचा,रक्त के अतिरिक्त प्रत्येक कोशिकाओं की गतिविधि को जाना एवं स्वयं संकेतों द्वारा उनपर नियंत्रण साधा जा सकता है.
सुप्रसिद्ध मनोवेत्ता एल्मरग्रीन का कहना है कि काया पर मन का आधिपत्य है, अतः उसे प्रशिक्षित कर के समस्त कायिक अंग-अवयवों, कोशिकाओं को वशवर्ती बनाया जा सकता है, क्योंकि ये सभी मन से संचालित हैं, इसलिए मांस-पेशिओं से उत्पन्न तनाव एवं सिरदर्द जैसी सामान्य बीमारियों को बायोफीडबैक द्वारा सरलतापूर्वक दूर किया जा सकता है. इससे सम्बद्ध व्यक्ति इलेक्ट्रोमायोग्राफ पर अपनी पेशिओं द्वारा छोड़े गए विद्दुतीय चुम्बकीय विकिरण को देखता और इच्छाशक्ति का प्रयोग कर उन्हें इच्छित तरीके से सिकुड़ने-फैलने का निर्देश देता है. अभ्यास द्वारा इससे उसी तरह के सुखद परिणाम निकलते हैं, जिस तरह प्रशिक्षित मस्तिष्क से शांति-दायक अल्फ़ा तरंगों के निर्माण से मिलते है. इस उपचार में किसी बाहरी चिकित्सक की आवश्यकता नहीं होती, वरन विशेषज्ञ द्वारा इलेक्ट्रोड आदि लगाने की प्रक्रिया ज्ञात हो जाने पर अकेले भी किया जा सकता है. यह पूर्णतः “ऑटोसजेशन” प्रक्रिया पर आधारित है.  राकफेलर विश्वविद्द्यालय के मनोविज्ञानी डा. एड्वंड डेवन ने इस विधि द्वारा विकलांग व्यक्तियों को संकल्पशक्ति को जगा बेकार बने अंगों को सक्रीय बनाने में आशातीत सफलता पाई. उनके अनुसार, इससे मांसपेशिओं की निष्क्रियता एवं तनाव को सफलता-पूर्वक दूर किया जा सकता है.
ह्रदय की गति-विधियों पर सामान्य मानव का कोई नियंत्रण नहीं होता, किन्तु योगाभ्यासियों के लिए नाडी की गति, ह्रदय की धडकन , आदि को इच्छानुसार घटा-बढ़ा लेना, लय-बद्धता को सुस्थिर कर लेना एक सामान्य क्रिया होती है. अभ्यास द्वारा ये अनेक्षिक पेशियो  को भी नियंत्रित कर लेने मैं वे समर्थ होते हैं. ह्रदय गति की अनियमितता “ सायनस टैकीकार्डिया “ से लेकर ह्रदयगति रुकने (हार्टब्लाक) तक का निमित्त कारण बनती है. अनुसंधानकर्ता डा. एल्मर ग्रीन ने ह्रदय रोगियों पर किये गए बायोफीडबैक अध्यनों में पाया है कि जिन व्यक्तियों की ह्रदय गति 110 प्रति मिनट थी , तीन मिनट के अभ्यास से वे 70 प्रति मिनट तक गति को कम करने में सफल हुए. यानि इच्छा शक्ति के विकास के साथ अन्तः प्रक्रियाओं पर नियंत्रण सधता जाता है.
हाईपरटेंशन अर्थात उच्च रक्तचाप इस शताब्दी की सबसे बड़ी बीमारी है. चिकित्सक और दवा भी कोई स्थाई राहत नहीं दे पाते. वस्तुतः यह एक मनो-शारीरिक रोग है, जो चिंतन-क्षेत्र की विषमता एवं तनाव के करण पनपता है. इसका उपचार भी तदनुरूप दूंढा जाना चाहिए. विशेषज्ञों ने अल्फ़ा ई.ई.जी फीडबैक को इसके लिए बहुत उपयुक्त माना है. एक ओर इस उपक्रम में जहाँ मन को विधेयात्मक विचारणाओं से परिपूरित करने का अवसर मिलता है वही भावना क्षेत्र का परिशोधन कर संकल्प को बढाया जाता है. ह्रदय की गति-विधियों एवं ब्लडप्रेशर को नियंत्रित करने में यह युक्ति बहुत कारागार सिद्ध हुई है.
यह सर्वविदित तथ्य है कि वर्तमान समय की अधिकाँश बीमारियों का जनक दैनिक जीवन में बढ़ता जा रहा तनाव है. इसीसे शरीर की ऊपरी त्वचा से लेकर रक्तवाहि शिराओं की आंतरिक संवेदन शीलता प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती. शवासन, शिथलासन जैसे योगाभ्यास परक प्रक्रियाओं द्वारा इस दूर कर लिए जाने का विधान योग-शाश्त्रों में है , फिरभी अब नये आविष्कारों के साथ ही मस्तिष्कीयशक्ति एवं यांत्रिक सुविधाओं के सम्मलित प्रयोग से कम समय में सफलता पूर्वक इसे संपन्न किया जा सकता है. इसी प्रकार थर्मल –सेंसर द्वारा शारीरिक तापमान के उतार-चढ़ाव को निरखा-परखा जा सकता है और स्वसंकेत द्वारा इसे नियमित स्तर पर लाया जा सकता है.
इसी प्रकार जी.एस.आर बायोफीडबैक द्वारा त्वचा की विद्दुत प्रतिरोधक क्षमता को घटाया-बढाया जा सकता है. बढ़ी हुई त्वचा प्रतिरोधक क्षमता तनावशैथिल्य एवं सक्रियता का चिन्ह है. मन की उत्तेजना व्यग्रता सबसे पहले त्वचा प्रतिरोध में ही परिलक्षित होती है. शरीर की प्रतिरोधी सामर्थ्य को शक्तिशाली बनाने हेतु स्वसंवेदन, ध्यान प्रक्रिया का प्रयोग किया जा सकता है एवं विधेयात्मक प्रतिक्रिया का संकेत यह उपकरण देता रह सकता है. इसे इक्कीसवीं सदी के “ इलेक्ट्रोनिक मैडिटेशन “ की उपमा दी गयी है.
इसके अतिरिक्त अनेक ऐसे उपकरण भी हैं, जिससे मनो-कायिक विदुतीय संकेतों को पकढ़ पाना तो संभव नहीं पर उस अवस्था का अनुमान लगाना सरल है, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि शरीर-मन कितने निष्क्रीय कितने सक्रीय हैं. मन की उत्साहहीनता शरीर पर बोझ बन कर सवार रहती है , जो कार्य के परिणाम को बड़े स्तर तक प्रभावित करती है. मनुष्य इन दिनों अपने ही कारणों को लेकर उधेडबुन में इस कदर फंसा हुआ है कि इससे उसकी मानसिक सजगता और तत्परता कुंद पड़ गयी है.
मानवीय मस्तिष्क सम्पूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है. इसके विभिन्न केन्द्रों और हिस्सों में जितना अधिक संतुलन, सक्रियता और प्रखरता होगी, व्यक्तित्व भी उसी के अनुरूप संतुलित, सफल और असफल होगा. विशेषग्य बताते है कि मस्तिष्क का बायाँ हिस्सा अनुभूति, अंतर्ज्ञान, भावना और समझ के लिए जिम्मेदार है जबकि दायाँ भाग तर्क,बुद्धि, विचार एवं विश्लेषण जैसी भूमिकाओं का निर्वाह करता है. अगर दोनों हिस्सों में सामंजस्य न हो तो स्तिथि ख़राब हो जाती है. इनके फर्क को जानने और नापने के लिए जो यंत्र उपयोग में लाया जाता है उसे “ मिरर इल्युसन “ कहा जाता है.. उपर्युक्त दोनों स्तिथियों में सामंजस्य में जप और ध्यान का अभ्यास काफी कारगर सिद्ध हुस है.
“न्यू माइंड – न्यू बॉडी “ नाम की अपनी पुस्तक में मनोचिकित्सक डॉ. बारबरा ब्राउन कहती है कि “ बायोफीडबैक “ द्वारा मन:स्तिथि  की उत्तेजना को शिथिली-करण में बदलना तथा मानसिक सजगता और मस्तिष्कीय सामंजस्य को आंकना इस युग की सबसे बड़ी उपलब्धि है. सचमुच यदि मनश्चेतना पर यंत्रों के माध्यम से ही सही, मनुष्य को योग-साधना द्वारा नियंत्रण करने की विद्या सिखाई जा सके, तो इसे चिकत्सा-विज्ञान का मानव जगत को अदभुत अनुदान कहा जायेगा.

इति.....  


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