षट चक्र भेदन की तीसरी साधना “मणिपुर चक्र
अनंत चेतना के विस्तार तक ले जाने वाली साधना
मणिपुर का शाब्दिक अर्थ है – “मणियों का नगर” . तिब्बतीय परम्परा में इस चक्र को ‘मणिपदम्’ भी कहते हैं. जिसका अर्थ है मणियों का कमल. चक्र संसथान में इसके विशेष स्थान है. यह सक्रियता, शक्ति, इच्छा तथा उपलब्धियों का केन्द्र है. योगियों ने इसकी तुलना सूर्य के तेज तथा ऊष्मा से की है. उनका मानना है कि जिस प्रकार सूर्य के अभाव में विश्व में जीवन का आस्तित्व संभव नहीं है , ठीक उसी प्रकार मणिपुर चक्र भी विभिन्न अवयवों , संस्थानों तथा जीवन की प्रक्रियाओं को नियमित करता है. इतना ही नहीं , यह सम्पूर्ण शरीर की प्राण उर्जा के प्रवाह का दायित्व वहां करता है.
इस चक्र का जितना महत्त्व स्थूल जीवन के क्रिया-कलापों के लिए है , उससे कहीं अधिक महत्त्व सूक्ष्म चेतना के लिए है.भौतिक जगत एवं भाव जगत के बाद तीसरा जगत है सूक्ष्म जगत. इससे सम्बंधित शरीर को योग शाश्त्रों में सूक्ष्म शरीर कहा है. इस शरीर का बीज स्थान यही मणिपुर चक्र है. सूक्ष्म तल पर इसकी दो संभावनाएं हैं. प्रथम है “संदेह” और “विचार” और दूसरी है श्रद्धा और विवेक . पहली सम्भावना प्रकृति ने सभी को स्वाभाविक रूप से डी है. दूसरी मणिपुर चक्र की साधना का परिणाम है. जिसके फलस्वरूप संदेह का रूपांतरण श्रद्धा में होता है और विचार विवेक में रूपांतरित हो जाता है.
मणिपुर चक्र की निष्क्रिय और निस्तेज अवस्था में संदेह एवं शंका व्यक्ति का स्वभाव बन जाते हैं. ऐसा व्यक्ति व्याधियों व अवसाद से ग्रस्त हो जाता है. उसमे प्रेरणा की कमी एवं अपने उत्तरदायित्यों के प्रति लापरवाही देखने को मिलती है. इसलिए मणिपुर चक्र की साधना योग साधकों के लिए महत्वपूर्ण आवश्यकता है ही , साथ ही यह उनके लिए उपयोगी भी है , जो जीवन के सम्पूर्ण आनंद की अनुभूति के लिए उत्सुक हैं.
यह चक्र नाभि के ठीक पीछे रीढ़ की हड्डी में स्तिथ है. अपनी इस शारीरिक स्तिथि के कारण इसे नाभि चक्र भी कहा जाता है. शरीर क्रिया-विज्ञान के अनुसार इस चक्र का सम्बन्ध सौर जालिका से है योग-साधना की बौद्ध परम्परा में इस चक्र को समूची साधना का आधार माना गया है. बौद्ध साधकों में प्रचलित महामंत्र " ॐ मनिपद्मेहूँ" प्रकारांतर से इस चक्र के जागरण की ही साधना है.
योग-शाश्त्रों में मणिपुर चक्र के प्रतीकात्मक रहस्य को बड़ी अदभुत रीति से दिखाया-दर्शाया गया है. इसके अनुसार दस पंखुड़ियों वाला एक चमकदार पीला कमल मणिपुर का प्रतीक है. कुछ तंत्र शाश्त्र इस कमल की पंखुड़ियों के रंग को भूरे बदल की तरह बताते हैं. इनमे से प्रत्येक पंखुड़ी पर नील कमल के रंग से " ड , ढ, ण, त, थ, द, धं , नं , पं ,फं और प्रत्येक अक्षर के उपर एक बिंदी विद्यमान होती है. कमल के मध्य में अग्नि का क्षेत्र है , जो गहरे लाल रंग का उल्टा त्रिकोण है. यह उगते हुए सूर्य की भांति चमकदार है. त्रिकोण की प्रत्येक भुजा पर स्वास्तिक के निशान बने हैं.
इस त्रिकोण के नीचे एक भेढ स्तिथ है. यह भेद मणिपुर चक्र की वाहक तथा क्रियाशीलता और अदम्य धैर्य का प्रतीक है. भेद के ऊपर मणिपुर का बीजमंत्र "रं" है. इसके बिंदु में देव रूद्र और देवी लाकिनी का निवास है. रूद्र देव शुद्ध सिंदूरी वर्ण के हैं और उनके पूरे शरीर में विभूति लिपटी है. उनकी तीन आंखे हैं. देवी लाकिनी सबका उपकार करने वाली हैं. उनके चार हाथ हैं. रंग काला और शरीर कांतिमय है. उनके वस्त्र पीले हैं. वह अनेकानेक आभुषण से सजी हुई हैं और अमृतपान के कारण आनंदमग्न हैं.
मणिपुर चक्र की तन्मात्रा 'द्रश्य" है. आंखे इनकी ज्ञानेन्द्रियाँ हैं और पाँव इनकी कर्मेन्द्रियाँ है. इन दोनों ही इन्द्रियों का पारस्परिक घनिष्ट सम्बन्ध है क्योकि व्यक्ति पहले देखता है फिर क्रियाशील होता है. मानुपुर का लोक "स्व:" है जो अस्तित्व (अस्मिता) का स्वर्गीय स्तर है. यह नश्वर जगत की अंतिम सीढ़ी है. हालाँकि यज प्रायः रजोगुणी है, जबकि निम्न चक्रों में जड़ता या तमोगुण ही विद्दमान रहता है. अग्नि इसका प्रधान तत्व है.
योग साधकों की अनुभूति है की बिंदु में स्तिथ चंद्रमा से मणिपुर चक्र में अमृत झरता है . यह अमृत यहाँ स्तिथ सूर्य का आहार बनता है. यह प्रक्रिया ही जीवन के ह्रास का कारण बनती है , जिसका परिणाम बीमारी, वृद्धावस्था और मृत्यु के रूप में सामने आता है. मणिपुर चक्र की साधना से इस आत्मघाती प्रक्रिया पर रोक लगाई जा सकती है. इस योग साधना से प्राण उर्जा मणिपुर द्वारा पुनः मस्तिष्क में वापस भेज डी जाती है. इस चक्र की साधना के अभाव में सांसारिक भोगों में ही जीवन की उर्जा का क्षय हो जाता है , जबकि साधना द्वारा यदि इस चक्र को शुद्ध और जाग्रत कर लिया जाये . तो शरीर व्याधि रहित एवं कांतिमय हो जाता है. साथ ही योगी की चेतना पुनः निम्न स्तरों पर वापस नहीं आती.
यही करण है कि योग-साधना की कुछ परम्पराओं में मणिपुर चक्र के नीचे के चक्रों के बारे में चर्चा तक नहीं की है क्योकि उनके अनुसार ये चक्र पशु जीवन के उच्च स्तरों से सम्बंधित हैं जबकि मणिपुर तथा उसके बाद के चक्र उच्च मानवीय स्तर से सम्बंधित है. योग-साधना के इन परम्पराओं में इस सत्य का स्पष्ट उल्लेख है कि यदि जाग्रत चेतना मणिपुर चक्र तक आ सकी , तभी जाग्रति को सुनिश्चित जाननी चाहिए. इन सभी द्र्ष्टियों से मणिपुर चक्र की साधना का विशेष महत्त्व है.
इस साधना के लिए साधक को अपने में द्रणप्रतिग्य तथा लगनशील होना चाहिए. मणिपुर चक्र की साधना के क्रम में प्रायः योग-सम्प्रदायों एवं शाश्त्रों में स्वर-योग की चर्चा की गयी है. स्वर-योग को श्वास विज्ञान या प्राणायाम की प्रक्रिया भी कहा जाता है. प्राणायाम की इस प्रक्रिया में प्राण और अपान के संयोग से मणिपुर चक्र का जागरण आसानी से हो जाता है , परन्तु इस साधना के लिए प्रत्यक्ष मार्गदर्शन अनिवार्य है.
प्राणायाम अथवा स्वरयोग की इस प्रक्रिया के अतिरिक्त भी एक सरल, सहज और सुगम विधि भी है. यह विधि उन योग साधकों के लिए है जी नियमित रूप से अपनी साधना संपन्न करते हैं. जप और ध्यान के नियमित अभ्यास के साथ यदि श्रद्धा की गहनता को जोड़ा जा सके , तो मणिपुर चक्र का परिशोधन और जागरण बड़ी ही सहजता से हो जाता है.
जपकाल में यदि श्रद्धा की गहनता हो तो प्राण और अपान दोनों ही नाभि केन्द्र में आकार मिलते हैं. सामान्य क्रम में जप वाणी से और जीभ से होता है , परन्तु श्रद्धा के अतिरेक में मन्त्र के स्वर नाभि से उठते हैं और इसी दौरान प्राण और अपान का संयोग भी होता है. मणिपुर में इन दोनों शक्तियों के मिलन से ऊष्मा और उर्जा उत्पन्न होती है. यही वह उर्जा है जिससे मणिपुर चक्र का जागरण होता है. इस पर साधना शक्ति के पपरिणाम स्वरूप शरीर में प्राण प्रवाह पूर्णरूपेण पुनर्संगठित होता है. जिससे मणिपुर चक्र की शक्तियां जाग्रत एवं विकसित होने लगती है.
इस विकास के फलस्वरूप योग साधक एक उच्च आअध्यत्मिक स्तिथि में होता है. ऐसे विकिसित अवस्था में उसे दुसरे लोकों की झलक दिखाई देने लगती है. मणिपुर चक्र की साधना करने वाले योग साधक की चेतना के अनंत स्तर का ज्ञान होता है. इस स्तर पर चेतना का विस्तार अनंत होता है , जो सुन्दरता, सत्य और पवित्रता से परिपूर्ण होता है. इस मार्गदर्शन के साथ ही साधक की सभी पूर्व धारणाएं अपने आप ही बदल जाती हैं. व्यक्तिगत द्वेष , मनोग्रंथियाँ तथा प्रवत्तियां सभी समाप्त हो जाती हैं. क्योकि अब चेतना के उच्च जगत की अनंत सुन्दरता तथा पूर्णता का समावेश हो जाता है , जो अगला चक्र अनहद के लिएअति आवश्यक है.
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