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षटचक्र भेदन का छठा चरण “आज्ञा चक्र की साधना”
ब्रह्म के साथ एकाकार कर अंतर्द्रष्टि जगाने वाली साधना

आज्ञा से एक ही अर्थ ध्वनित होता है ‘ आदेश’. इस अर्थ में आज्ञाचक्र समूचे अस्तित्व का नियंत्रण केंद्र है. ज्योतिष शाश्त्र में इसे ब्रहस्पति का केन्द्र बताया गया है, जो गुरु का प्रतीक है. बृहस्पति देवगुरु हैं, इसलिए इसे गुरुचाक्र भी कहा जाता है. इसे अंतर्ज्ञान चक्षु के नाम से भी जाना जाता है. यही वह मार्ग है जिसके माध्यम से व्यक्ति चेतना के सूक्ष्म एवं अतीन्द्रीय आयाम में पहुचता है. इस चक्र का सबसे प्रसद्धि नाम तीसरी आँख भी है. प्रत्येक देश की प्रचलित साधनाओं-पद्धतियों में किसी न किसी रूप में इसकी चर्चा की गयी है. इसे शिव की आँख भी कहा जाता है, क्योकि शिव को ध्यान का सार माना गया है, जिसका आज्ञाचक्र से सीधा सम्बन्ध है. कुछ शाश्त्रों में इसका वर्णन दिव्य चक्षु या ज्ञान चक्र के रूप में भी मिलता है, क्योकि इसके द्वारा योग साधक को गुप्त अस्तित्व की प्रकृति का पता चलता है.
यह वह स्थान है , जहाँ तीन प्रमुख नाड़ियाँ – इडा, पिंगला और सुषुम्ना का मिलन होता है. ये तीनों एक प्रवाह के रूप में चेतना के सर्वोच्च केन्द्र सहस्त्रार तक पहुँचती है. योग सम्प्रदायों में यह प्रचलित विश्वास है कि अपने देश की तीन पवित्र नदियाँ इन तीन नाणीयों का प्रतिनिधित्व करती हैं. इडा नाणी की प्रतीक गंगा हैं, पिंगला की प्रतीक यमुना हैं, जबकि सरस्वती-सुषुम्ना का प्रतिनिधित्व करती हैं. इन तीनों का संगम आज्ञाचक्र का प्रतीक है. जब इस स्थान पर ध्यान की गहनता उभरती है, तब तीन बड़ी शक्तियों के मिलन के फलस्वरूप व्यक्तिगत चेतना का रूपांतरण हो जाता है.
व्यक्तिगत चेतना में मुख्यतः अहं ही द्वैत भाव का या भेदबुद्धि का कारण है. जब तक यह द्वैत अथवा भेद बुद्धि है , तब तक समाधि अवस्था की प्राप्ति असंभव है. आज्ञाचक्र की साधना इस द्वैत भाव को सर्वथा विलीन-विसर्जित कलर देती है. साधना के इस क्रम में एक मजेदार बात यह भी है कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में आज्ञाचक्र अधिक सक्रीय होता है. इस लिए वो अधिक सूक्ष्म, संवेदनशील और ग्रहणशील होती हैं. यही कारण है कि महिलाओं में पूर्वाभास की क्षमता पुरुषों की तुलना में ज्यादा होती है.
आज्ञाचक्र की उपस्तिथि मस्तिष्क में भ्रू-मध्य के ठीक पीछे, रीढ़ की हड्डी के एकदम ऊपर, मेरुरज्जु में अनुभव की गयी है. हालाँकि साधना के प्रराम्भ में इसकी स्तिथि और स्थान को जानना बहुत कठिन है. इसीलिए भ्रू-मध्य में उसके क्षेत्र विशेष पर ध्यान किया जाता है. यहाँ यह कह देना आवश्यक है कि आज्ञाचक्र और पीनिअल ग्रंथि दोनों एक ही हैं, जबकि पियुषिका ग्रंथि सहस्त्रार है. पीनिअल और पियुषिका ग्रंथियों की भांति आज्ञाचक्र एवं सहस्त्रार में नजदीकी सम्बन्ध है. यदि आज्ञाचक्र का जागरण हो चूका हो तो सहस्त्रार के जागरण की उपलब्धि एवं अनुभूतियों को संभाला जा सकता है.
योगशाश्त्रों में आज्ञाचक्र को प्रीकात्मक रूप से द्विदल कमल के रूप में चित्रित किया गया है. इस प्रतीकात्मक विवरण के अनुसार इसका रंग पीला, हल्का भूरा तथा स्लेटी सा है. परन्तु अनुभवी साधकों का मत है कि ध्यान की प्रगाढ़ता में यह चन्द्रमा या चंडी जैसा सफ़ेद दिखाई देता है. इस द्विदल कमल की बायीं पंखुड़ी पर “हं” तथा बायीं पंखुड़ी पर “क्षं” अंकित हैं. “हं” और “क्षं” चमकीले सफ़ेद रंग में हैं और ये शिव-शक्ति के बीज मन्त्र हैं. इनमें से एक चन्द्र नाणी या इडा की प्रतीक हैं और दूसरा सूर्य नाडी या पिंगला का प्रतीक है. इस चक्र के नीचे तीनों नाणीयां आकर मिलतीं हैं. बायीं तरफ से इडा और दायीं तरफ से पिंगला एवं बीच में सुषुम्ना.
आज्ञाचक्र के द्विदल कमल के भीतर एक पूर्ण वृत्त है, जो शून्य का प्रतीक है. इस वृत्त के अन्दर एक त्रिकोण है जो शक्ति की रचनात्मकता एवं अभिव्यक्ति का बोध कराता है. कुछ उच्च स्तरीय योग साधकों ने इसे ब्रह्म योगी के रूप में भी जाना है. इस त्रिकोण के ऊपर एक काला शिवलिंग है. यह साधक के सूक्ष्म शरीर का प्रतीक है, जो साधक की चेतना के विकास के अनुरूप परिवर्तित रंग में दिखाई पड़ सकता है.
जब कोई अविकसित साधक ध्यान करता है , तो उसे यह शिवलिंग धुएं की तरह दिकाही देता है और बार-बार प्रकट होता और लोप होता दिखता है. गहरे और शांत ध्यान में यह शिवलिंग काला दिखाई देता है. इस काले शिवलिंग पर ध्यान करने से सूक्ष्म चेतना में प्रकाशवान ज्योतिर्लिंग प्रकट होता है. जो साधक के उच्चस्तरीय एवं विकसित चेतना का द्योतक है. इस शिवलिंग के ऊपर परम्परागत प्रतीक ऊँ  है. यही आज्ञाचक्र का प्रतीक एवं बीजमंत्र है. परमशिव आज्ञाचक्र के देवता हैं. जो एक प्रकाश की माला की भांति चमकते हैं. छह मुख वाली हाकिनी इसकी देवी हैं, जो अनके चंद्रमाओं की भांति दिखाई देती हैं.
आज्ञाचक्र की तन्मात्रा , ज्ञानेंद्रीय एवं कर्मेंद्रीय सभी कुछ मन है. यहाँ मन को सूक्ष्म माध्यमों से ज्ञान व संकेत प्राप्त होतें हैं. आज्ञाचक्र की साधना के साथ ही साधक अपने छटे शरीर जिसे ब्रह्म शरीर कहते हैं , में प्रवेश करता है. ऐसी दशा में वह हमेशा ब्रह्म के साथ एकाकार अवस्था में रहता है और अनेकानेक शक्तियों का स्वामी होता है.
आज्ञाचक्र के जागरण की साधना, ध्यान है. भ्रू-मध्य में ज्योति अथवा उगते हुए सूर्य का ध्यान करने से आज्ञाचक्र स्फुरित और जाग्रत होने लगता है. ध्यान साधना के इस क्रम में अपने इष्ट देव-देवी का भी ध्यान किया जा सकता है. इन सबके बावजूद आज्ञाचक्र की सिद्धि के लिए जो सबसे प्रभावी एवं शीघ्र फलदायी उपाय है वह है उगते हुए सूर्य मंडल के मध्य परमपूज्य सद्गुरु का ध्यान. यदि यह ध्यान-साधना नियमित एवं प्रगाढ़ हो , तो मात्र छह महीने में ही अपनी सफलता के संकेत देने लगती है. इस शीघ्र सफलता का एक कारण यह भी है कि आज्ञाचक्र गुरुचाक्र भी है. गुरु तत्व की अनुभूति जितनी सघन यहाँ हो पाती है, उतनी और कहीं संभव नहीं.
इस साधना से लोक लोकांतर के द्वार खुलते हैं. आज्ञाचक्र की इस साधना के क्रम में दिव्य लोक की शक्तियों से संपर्क-सानिध्य एक सामान्य सी बात बन जाती है. यह तो इस साधना क्रम की शुरुवाती सफलता भर है. अपने सद्गुरु के सन्देश और आदेश भी इसी साधना से जाने,सुने और समझे जाते हैं. संक्षेप में आज्ञाचक्र की साधना के परिणाम अनुभूति के विषय हैं. इन्हें लिख पाना एक लेख में तो क्या एक ग्रन्थ में भी संभव नहीं है परन्तु यहाँ यह कह देना निहायत ही अनिवार्य है कि आज्ञाचक्र के साधक के लिए समूचा जीवन तपोमय होना चाहिए अन्यथा साडी उपलब्धियां , अनुभूतियाँ कपूर की भांति उड़ जाती हैं. तपोनिष्ट जीवन ही आज्ञाचक्र की ध्यान-साधना और उसकी सिद्धि का आधार है. मन, वचन और कर्म से तप, यही आज्ञाचक्र की सफलता का मूल मंत्र है.

आज्ञाचक्र के साधकों और जिज्ञासुओं के लिए यहाँ एक बात बता देना अनिवार्य है कि आज्ञाचक्र के जागरण के अगणित लाभों से जो सबसे कीमती लाभ है , वह यह है कि साधक इससे प्राप्त अंतर्द्रष्टि से स्वयं को भली-भांति पहचान सकता है. यहाँ पर विद्यमान शिव ग्रंथि भेदन करके अपनी योग साधना के अवरोधों का निवारण और निराकरण कर सकता है. इस शिव ग्रंथि का भेदन होते ही साड़ी अलौकिक शक्तियां – सिद्धियों से लगाव अपने आप ही समाप्त हो जाता है. इसके बाद तो जीवन का हर पल, स्रष्टि की हर घटना भगवत लीला के रूप में अनुभव होने लगती है. इस अनुभूति की प्रगाढ़ता और इससे एकात्मता के लिए साधक को सहस्त्रदल कमल- सहस्त्रार में प्रवेश करना पड़ता है.    

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