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प्राणमय कोश की साधना
प्राण शक्ति का संतुलन और संकल्प बल का समावेश
महयोगियों ने अपने अनुभव से सिद्ध किया है कि प्राणमयकोश के प्राणयोग से जीवन में चमत्कारी परिवर्तन संभव है. यह सुनिश्चित सत्य है कि प्राणमयकोश को परिष्क्र्त एवं सबल बनाकर केवल अपने शरीर, बल्कि दूसरे शरीरों को भी प्रभावित और विकसित किया जा सकता है.
योग विज्ञान का मत है कि प्राणशक्ति ही जीवात्मा की सत सत्ता को चित्त सत्ता से परिपूर्ण बनाती है. इन दोनों का समन्वय हो जाने से ही जीवन के विविध क्रियाकलाप
बन पड़ते है. सत-चित्त-आनंद की संभावनाएं हमारे चारों ओर भरी बिखरी पड़ी है. उपभोक्ता में आत्मा की सत्ता मौजूद है, फिर भी सबकुछ असंभव बना रहता है. अशक्तिजन्य दरिद्रता प्राणी को घेरे रहती है. जीवधारी को प्राणी कहने का मतलब यही है कि उसके जीवन की प्रक्रिया प्राणशक्ति के सहारे ही चल रही है. शरीर में ज्यों ही प्राण की कमी हुई कि प्राणांत की स्तिथि सामने खडी होती है.
मनुष्य में जो चमक, चेतना, स्फूर्ति, तत्परता, तन्मयता दिखाई देती है, वह सब उसके प्राणमयकोश की ही उर्जा है. यह उर्जा जिसमे जितनी कम होगी, वह उतना ही निस्तेज, निर्जीव एवं निर्बल दिखाई देगा. उत्साह, साहस और संतुलन की उपलब्धियां प्राणशक्ति की ही मात्रा पर ही निर्भर रहती है. तपस्वी, मनस्वी, तेजस्वी, ओजस्वी महामानवों की प्रखरता उसमे विद्दमान प्राणमयकोश की उर्जा का परिमाण प्रकट करती है. संकल्पशक्ति , इच्छाशक्ति, द्रढ़ता और सुनिश्चितता में यही प्रकट होती रहती है.
अपनी अनेक गतिविधियों के बावजूद प्राण तत्व एक है. मानवीय काया में प्राणशक्ति को विभिन्न उत्तरदायित्व निबाहने पड़ते है, उन्ही के आधार पर प्राण को अलग अलग नामों से जाना जाता है. इस प्रथकता के मूल में एकता विद्द्य्मान है. प्राण अनेक नहीं है. उसके विभिन्न प्रयोजनों में व्यवहारपद्धति ही अलग अलग है.
इसी के आधार पर शाश्त्रकारों ने इसे कई भागों में विभाजित किया है. कई नाम दिए है और कई तरह से व्याख्या की है. उसका औचित्य होते हुए भी इस भ्रम में पड़ने की जरूरत नहीं है कि प्राणतत्व कितने प्रकार का है और इन प्रकारों में किस तरह की भिन्नता एवं विसंगतियां है. शाश्त्रीय विभाजन के अनुसार प्राण को दस भागों में बाटा गया है. इनमे पांच प्राण और पांच उपप्राण हैं. प्राणमयकोश इन्ही दस के समिश्रण से बनता है. पांच मुख्य प्राणों को ०१. अपान ०२. समान ०३. प्राण ०४. उदान ०५.व्यान कहा है. पांच उपप्राणों को ०१. देवदत्त ०२. कुक्रल ०३.कुर्म ०४. नाग ०५. धनञ्जय नाम दिया गया है.
इनके कार्यों का विवेचन कुछ इस तरह से है :- ०१.अपानशरीर के मलों को बाहर फेकता है. ०२. समानपाचक रसों का उत्पादन और उनके स्तर को उपयुक्त बनाय रखता है. ०३. प्राणश्वास प्रक्रिया के साथ शरीर में बल का संचार करता है. ०४. उदानजीवनीशक्ति के उध्र्व्गमन की अनेकों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष क्रियायों को नियंत्रित करता है. ०५. व्यानसम्पूर्ण शरीर में व्याप्त हो कर संवेदनाओं का संचार करता है.
उपप्राणों के प्रकरण में ०१. देवदत्त -, जो मुखमंडल और उनसे जुड़े अवयवों का प्रहरी है. ०२. कुक्रलइसका अधिकार क्षेत्र कंठ और उससे होने वाली क्रियायों पर है. ०३. कुर्मउदार क्षेत्र के अवयवों की साज संभाल करता है. ०४. नागजननेन्द्रियों का अधिकारी है कुण्डलनी शक्ति एवं प्रजनन पर इसी का अधिकार है. ०५. धनञ्जयइसका कार्य क्षेत्र जंघाओं से एडी तक है. गतिशीलता, स्फूर्ति एवं अग्रगमन का उत्साह इसी की समुन्नत स्तिथि का सुपरिणाम है.
प्राणशक्ति का यथास्थान संतुलन बना रहे, तो जीवन सत्ता के सभी अंग प्रत्यंग ठीक तरह से काम करते रहेंगे. शरीर स्वस्थ रहेगा , तो मन भी प्रसन्न रहेगा, अन्तःकरण में सद्भाव और संतोष झलकेगा. भावना क्षेत्रों में विक्रत हुई प्राण सत्ता मनुष्य को नरकीटक, नर पिशाचों के घिनौने गर्त में गिरा देती है. पतन के अनेकों आधार प्राणतत्व की विक्रति से सम्बंधित होते हैं.
प्राणमयकोश का प्राणयोग ही इन सब विक्रतियों से उबारने का एकमात्र उपाय-उपचार है. प्राणयोग के अंतर्गत आसन-प्राणायाम-बन्ध, मुद्राएँ,की अनेकानेक प्रक्रियाएं आती हैं. इन सभी में प्राणायाम को विशेष दर्जा दिया गया है. प्राणायाम में प्रबल संकल्प शक्ति का समावेश करना पड़ता है. प्राणविद्द्या की इस साधना के पश्चात ही मनोमय कोश के परिष्कार का मार्ग प्रशस्त होता है.
इति...    













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